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                          'कामायनी' प्रसादजी की आन्तिम प्रीढ़ कृति है। सन् १९३५ में प्रकाशित उसका कथानक बहुत संक्षिप्तहै । इसमें मनु के अतिरिक्त संपूर्ण दैवजातिं प्रलय का शिकार हो जाती है और मनु तथा श्रद्धा याकामायनी के सयोग से मानव सभ्यता का प्रवर्तन होता है । इसका कथानक बहुत संक्षिप्त है । लेकिन उसमें कवि ने जीवन के अनेक पक्षों को समान्वित करके मानव जीवन केलिए एक व्यापक आदर्श व्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया है। प्रसादजी ने श्रद्धा, इंडा, मनु जैसे प्रमुख पात्रों के चरित्रांकन, मनुष्य की अनुभूतियों, कामनाओं और आकाक्षाओं की अनेक रूपता का वर्णन किया है! यह मनोवैज्ञानिक पक्ष है।  उसमें मनु के माध्यम से चिंता, आशा, वासना, संघर्ष, आनन्द आदि का विवेचन में किया है ।
जयशंकर प्रसाद जी ने प्राचीन भारतीय ग्रन्धों में से कामायनी कथा की प्रेरणा प्राप्त की औरभारतीय दर्शन के योग से उसका निरुपण किया । उपनिषदों का अद्वैत, शैव - दर्शन की समरता, आनन्द बौद्धों की करुणा सभी की छाया के दर्शन इसमें होते है। चिन्तन - मनन दार्शनिकता और काव्य काअदभूत सामंजस्य 'कामायनी' मैं देखने को मिलता है । कामायनी में मनु, श्रद्धा, इंडा, मानव आदि प्रमुख पात्र हैं । कामायनी का" मनु अपने कठिन संघर्ष के बाद जीवन में समरसता स्थापित कर आनन्द प्राप्त कर लेता है! यह श्रद्धाजन्य आनन्दवाद ही कामायनी का लक्ष्य है । देश, काल, और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर मानव और मानवता की विषयवस्तु के साथ 'कामायनी' नये युग का गौरवशाली महाकाव्य बन गया है।

'कामायनी' एक ऐसे स्वच्छन्द कवि की रचना है, जिसने पुराण, इतिहास और कवि की निजीअनुभूति का समन्वय किया । 'कामायनी' हिन्दी साहित्य की एक गौरवशाली उपलब्धि है । 'कामायनी, केवल व्यक्ति जीवन की ऐतिहासिक कथा नहीं है, उन पात्रों की साँकेतिक व्यंजनाएँ भी उसमें है । कवि ने 'कामायनी' में बुछिवाद के विरोध में हृदय तत्व की प्रतिष्ठा करते हुए शैव दर्शन के आनन्दवाद को जीवन के पूर्ण उत्कर्ष का साधन माना है । श्रद्धा की प्रेरणा से मनु, कामना के बन्धनों से ऊपर उठाकर सामरस्य के आनन्द की उपलब्धि देने में तत्पर रहा है । इसी क्रम में कवि ने सारस्वत प्रदेश की यन्त्राश्रित सभ्यता के वर्णन में अपनी समकालीन सामाजिक व्यवस्था की विषमता का मित्रण भी किया है । उन्होंने कामायनी को अपने परिवेश से सम्बन्द्ध करने का प्रवास किया है । कामायनी मूलत: व्यक्तिवादी अध्यात्मवादी चेतना से युक्त है, जो अपने युग के यथार्थ धरातल पर समाधान करने में असमर्थ रही हैं ।

      'कामायनी' के विविध सर्गों में आधुनिक सन्दर्भों का संकेत मिलता है । स्वप्न और संघर्ष नामक सगों में सारस्वत प्रदेश का जो वर्णन किया है, उसमें पूँजीवादी सभ्यता और वर्ग संघर्ष का संकेत है । स्वप्न सर्ग में औद्योगीकरण का भी उल्लेख मिलता है! अंतिम सगों में प्रत्यभिज्ञा दर्शन का विशेष प्रभाव भी दिखाई पडता है ।

प्रसादजी ने इसमें सामंती व्यवस्था के मनु के विरुद्ध आधुनिक प्रजातांत्रिक विचारों से संपन्नसारस्वत नगर की प्रजा के संघर्ष की निरन्तरता और असुरों पर देवताओं की विजय दिखाते हुएप्रसादजी ने कामायनी में संघर्ष को ही महत्व दिया है ।

'कामायनी' का अन्त रहस्यवाद और आनन्द की प्रतिक्षा में हुआ है । लेकिन 'कामायनी' की महत्ता उसके आध्यात्मिक दार्शनिक विचारों के कारण न होकर श्रद्धा और इंडा के द्वारा कर्म क्षेत्र को अपनाकर जीवन के प्रति आस्था की प्रतिष्ठा में अधिक है ।
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