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प्रगतिवाद
                          साहित्य में प्रगति का अर्थ है मार्क्सवादी विचार धारा द्वारा निधारित दिशा में आगे बढ़ना। जो साहित्य मार्क्सवादी विचार धारा का समर्थन करता हुआ उस दिशा में आगे बढने की प्रेरणा देता है उसे प्रगतिवाद साहित्य की संज्ञा से अभिभूत किया जाता है। मार्क्स के इस जीवन दर्शन के अनुसार जगत की सभी वस्तुओं में विरोधी तत्वों का संघर्ष होता रहता है। प्रगतिवाद व्यक्ति को समष्टि अलग कर नहीं देखता और साहित्य को समष्टिगत चेतना मानता है, अत: प्रगतिवादी साहित्य समाज के सुख दुख की अभिव्यक्ति को महत्व देता है। समष्टि की रक्षा में प्रव्त्त होता है। प्रगतिवादी लेखक अपनी अभिव्यक्ति के उपकरण जनजीवन से ग्रहण करता है और रूप मोह में न पड़कर जीवन को उसकी संपूर्ण कुरूपता और अनगठपन के साथ प्रस्तुत करता है।

      प्रगतिवादी सहित्यकारों में पंत, निराला,प्रेमचंद,यशपाल,नागार्जुन,डा.रामविलास शर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय है। ये सब लोग भी कट्टर प्रगतिवादी अवस्था के साहित्यकार नहीं है। शिल्प की द्र्ष्टि से प्रगतिवादी साहित्यकार सरलता के समर्थक है। उसकी भाषा व्यावहारिक और शैली प्रखर होती है। व्यंग्य उनकी प्रधान अस्त्र है।