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       तुलसीदास सर्वश्रेष्ट राम भक्त कवि थे । राम भक्ति साहित्य में 'रामचरितमानस' का स्थान अद्वितीय है । हिन्दी के राम भक्ति साहित्य से यदि 'मानस' को अलग कर दिया जाए तो उसमें कुछ भी शेष न रहेगा ।यदि 'रामचरितमानस' से अयोध्याकाण्ड को अलग कर दिया जाय तो मानस का साहित्य महत्व बहुत कम होता है ।
             
आलोचकों का मत है कि अयोध्याकाण्ड की रचना गोस्वामी ने सबसे पहले की थी । कथन का आधार ,अयोध्याकाण्ड की प्रांरभ की सूक्तियाँ है । इससे निशंक है कि यह काण्ड स्वय संपूर्ण है । अन्य काण्डों की अपेक्षा,कार्य की अधिकता इस काण्ड में है । सद-असद पक्षों का संघर्ष भी इसमें परिलक्षित है । प्रारंभ के दस दोहों में परिचय मात्र मिलती है । ग्यारहवां से संघर्ष की झलक मिलती है । वह संघर्ष अपने चरम सीमा पर तभी पहुंचता है जब कैकेयी राजा दशरथ से राम का वनवास और भरत के राजतिलक का वरदान माँगती है। राम के वन गमन के अवसर तक संघर्ष बढता ही जाता है । उसके बाद भरत आते है और अपने भाई को वापस ले आने केलिए चलते है । इसमें भलागम का प्रश्न नहीँ होता, यहि कवि की कुशलता है । अयोध्याकाण्ड में सब से प्रमुख चरित्र भरत का है । भरत का त्याग लक्ष्मण के त्याग से कम नहीं । राम और सीता का चरित्र आदर्श चरित्रों की कोठी में है । ऐसे चरित्रों का अंकन करते समय तुलसीदासजी ने समस्त मानवीय आदशों का सन्निवेश किया है ।
          
सामाजिक और पारिवारिक जीवन का सर्वश्रेष्ठ त्रित्र अयोध्याकाण्ड में है। प्रजा तो लौकप्रिय राम केलिए अपना सब कुछ देने को प्रस्तुत हो जाती है । भरत, राम के अधिकार को ग्रहण करना नहीं चाहते । आचार्य को राजा और राजकुमार सभी आदर की दृष्टि से देखतें हैं । ब्राह्मणों और विद्वानों की आदार भी होते हैं। भक्ति का विवेचन अनेक स्थलों पर हुई है । साहित्य सौन्दर्य की दृष्टि से भी अयोध्याकाण्ड को विशेष महत्व है । इसमें प्रकृति के सजीव चित्रण मिलते है । करुणा,रौद्र, भयानक,वात्सल्य तथा भक्ति का विस्तृत वर्णन भी प्रस्तुत काण्ड में हुआ है । भाव पक्ष के साथ मानस का कलापक्ष भी अत्यंत उत्कृष्ट है । मानस का सन्देश बहुत व्यापक है । गोस्वामी मानस के मध्यम से एक नवीन साधना पद्धति का प्रतिपादन करना चाहते थे वह है राम भक्ति । उसमें न तो कर्मकाण्ड है न बाह्याडम्बर । धार्मिक आदर्शों की स्थापनाओं के साथ वे सामाजिक आदर्शों को भी सामने रखते थे । इसी प्रकार गोस्वामी विभिन्न सप्रदायों और वर्गों कों एक दूसरे के निकट लाना चाहता था । इस प्रवृति को समन्वयवाद कहते है । इस दिशा में तुलसीदास सफल हुए । साहित्य में भी वे नवीनता और प्राचीनता का समन्वय करना चाहते थे ।
                  
तुलसीदास के काव्य में लोकमंगल की भाव अधिक है। अनुभूति की सत्यता और तीव्रता भी अधिक है। स्वभाविक अलंकार उनके काव्य का अलंकार बढा देता है । वे कविता को गंगा की धारा के समान पवित्र मानते है। उन्होंने प्रकृति के प्रतीकों को ग्रहण किया । ऋतुओं के स्वाभाविक स्वरूपं उन्होंने प्रस्तुत किया है । ऋतु वर्णन केवल कलात्मक प्रदर्शनी केलिए नहीं, कथानक उपयोगिता केलिए किया है। पात्रों की भावों को अधिक मुखरित करने केलिए वन, पर्वत, सरिता, लता का वर्णन किया है। श्रृंगार, करणा, वात्सल्य, बीभत्स्य, वीर आदि रसों का प्रप्तिपाध्य रामचरितमानस में हुआ है । इस प्रकार रामचरितमानस सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य के स्थान पर विराजित है। यदि रामचरितमानस से अयोध्याकाण्ड को अलग कर दिया जाय तो मानस का साहित्य महत्व बहुत कम हो जायेगा । इस प्रकार स्पष्ट है कि अयोध्याकाण्ड मानस का सर्वश्रेष्ठ और महत्वपूर्ण सोपान है।
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रामचरित मानस