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शब्दशक्ति
                     किसी उक्ति में शब्द, अर्थ दोनों अनिवार्य है। शब्द विहीन अर्थ और अर्थ हीन शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती। शब्द और अर्थ एक एक दूसरे मिले जुले रहते हैं। जैसे काव्य केलिए सुंदर शब्दों की आवश्यकता होती है, वैसे ही उसमें व्यक्त होनेवाले सुंदर अर्थ की शब्द का अर्थ प्रसंग के अनुसार लिया जाता है। पशुओं के मध्य एक विशेष आकार की पशु केलिए बैल शब्द का प्रयोग होता है। परंतु किसी मूर्ख और विवेक शून्य पुरुष को कोई बात समझाते जब ऊब और खिचकर कोई कह बैठता है कि ‘ तुम तो नीरे बैल हो ’ । तब बैल का आशय उस पशु की सी बुद्धि हीनता है। वाक्य प्रसंग के अनुसार बैल शब्द का अर्थ लिया जाता है।

      वाक्य के अंतर्गत किसी शब्द का मुख्य या अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है। अर्थ के तीन भेद माने गये हैं।

      केवल सार्थक शब्दों में किसी व्यक्ति, पदार्थ, वस्तु, क्रिया आदि का ज्ञान कराने की शक्ति होती है। ऐसे शब्दों का ठीक अर्थ वाक्य के शब्दों के बीच उनके ज्ञान प्रयोग से ही निश्चित होता है।